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झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ही नहीं, BJP के कई नेता भी मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव हार चुके है


झारखण्ड में मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के हारने की पुरानी परम्परा रही है. हेमंत सोरेन और मधु कोड़ा मुख्यमंत्री रहते हुए हारे थे. अर्जुन मुंडा और शिबू सोरेन को भी चुनावी समर में हार का मुंह देखना पड़ा है. रघुवर इस सिलसिले की नई कड़ी हैं. लेकिन रघुबर ने झारखंड की परंपरा को ही नहीं बढ़ाया. उनकी पार्टी में उनसे पहले दो और मुख्यमंत्री थे जो मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा का चुनाव हारे थे.

सन 1971 का लोकसभा चुनाव ‘इंदिरा हटाओ’ बनाम ‘गरीबी हटाओ’ का चुनाव था. 1989 के चुनाव में वीपी सिंह के लिए ‘राजा नहीं से फ़कीर है देश की तकदीर है’ नारा चला था. 2014 का लोकसभा चुनाव ‘अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे पर लड़ा गया. 2019 का झारखंड विधानसभा चुनाव ‘घर-घर रघुवर’ पर लड़ा जा रहा था. लेकिन जनता ने मुख्यमंत्री रघुवर दास को घर से बाहर कर दिया. वो जमशेदपुर पूर्व से पिछले 25 साल से विधायक रहे थे. लेकिन इस बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा. वो भी अपनी ही कैबिनेट में मंत्री रहे सरयू राय से.

झारखंड में सरयू राय की छवि भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े नेता की रही है. संयुक्त बिहार में उनकी गिनती चारा घोटाला को उजागर करने वाले नेता के तौर पर रही थी. झारखंड में उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के कार्यकाल में हुए घोटालों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. आखिरकार मधु कोड़ा को जेल जाना पड़ा. सरयू राय 2005 में जमशेदपुर (पश्चिम) सीट से पहली दफा विधायक बने थे. रघुवर दास जमशेदपुर (पूर्व) सीट से लगातार 25 साल विधायक रहे हैं. एक ही जिले का होने के बावजूद दोनों नेताओं के बीच बहुत कम बातचीत रही है. ऐसे में जब रघुवर दास को मुख्यमंत्री बनाया गया तो सरयू राय इसे निगल नहीं पा रहे थे.

रघुबर दास


झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ही नहीं, BJP के कई नेता भी मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव हार चुके है

झारखंड के सिमडेगा में 19 अक्टूबर, 2017 11 साल की बच्ची संतोषी ने भूख की वजह से दम तोड़ दिया. इस घटना ने पूरे देश को हिलाकार रख दिया. मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक, संतोषी के परिवार को पिछले आठ महीने से राशन नहीं मिल रहा था क्योंकि उनका राशन और आधार कार्ड लिंक्ड नहीं था. रांची के एक पत्रकार का कहना है कि यह घटना रघुवर दास और सरयू राय के बीच तनातनी की पहली वजह बनी. जब कैबिनेट में आधार कार्ड और राशन कार्ड लिंक करवाने का प्रस्ताव सामने आया तो सरयू राय ने इसका जमकर विरोध किया था. लेकिन मुख्य सचिव राजबाला बर्मा इस प्रस्ताव के पक्ष में अड़ी हुई थीं. राजबाला और सरयू राय के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं थे. राजबाला किसी दौर में लालू प्रसाद यादव की चहेती आईएएस रही थीं. उन पर चारा घोटाले में लापरवाही बरतने का आरोप था. दोनों के बीच तब से रिश्ते अच्छे नहीं थे. आखिरकार मुख्यमंत्री के कहने पर इस कानून को मंजूरी दे दी गई. लेकिन सिमडेगा का मामला सामने आने के बाद सरयू राय ने राजबाला को मुख्य सचिव के पद से हटाने की मांग की थी. जिसे अनसुना करते हुए रघुवर दास ने राजबाला को एक अतिरिक्त कार्यकाल दे दिया था.

दूसरा मोरहदा जलापूर्ति योजना को लेकर था. इस योजना के तहत जमशेदपुर (पूर्व) विधानसभा के एक बड़े हिस्से में पानी सप्लाई शुरू होने वाली थी. 2006 में विश्व बैंक अपने खर्च पर इस योजना का बना रहा था. 2018 में राज्य सरकार के 58 करोड़ रुपए लगने के बावजूद यह योजना एक बूंद पानी नहीं सप्लाई कर पाई थी. सरयू राय ने एक कैबिनेट मीटिंग में मुख्यमंत्री को चेतावनी देते हुए कहा कि जिस रस्ते पर आप चल रहे हैं वो आपको मधु कोड़ा तक ले जाएगा. इसके बाद से दोनों के बीच तल्खी बहुत बढ़ गई.


भुवनचंद्र खंडूरी: बीजेपी जरूरी बताती रही और निशंक मनाने को तैयार नहीं हुए

झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ही नहीं, BJP के कई नेता भी मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव हार चुके है

उत्तराखंड में निर्वाचन का दिन 30 जनवरी 2012. जब मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी अपने निर्वाचन क्षेत्र में पहुंचे. पोलिंग बूथ पर बीजेपी के कार्यकर्ता नदारद थे. जब उन्होंने पूछताछ की तो पता चला कि कार्यकर्ता खाना खाने गए हुए हैं. लेकिन जब उन्हें कई पोलिंग बूथ पर वही नजारा दिखाई दिया तो उन्हें समझ में आ गया कि बाजी उनके हाथ से फिसल चुकी है. नतीजे उनकी आशंका की पुष्टि भर थे. वो कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी से 4,623 वोट से चुनाव हार चुके थे.

हिमाचल प्रदेश शांता कुमार: राम मंदिर के दौर में हारने वाला मुख्यमंत्री

झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ही नहीं, BJP के कई नेता भी मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव हार चुके है

सन 1990 हिमाचल प्रदेश में शांता कुमार ऐतिहासिक जनादेश के साथ सत्ता में आए थे. 68 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी और जनता दल के गठबंधन को 57 सीट हासिल हुई थी. सत्ता में आते ही शांता ने तेज गति से सुधार करने शुरू किए. इसमें दो निर्णय महत्वपूर्ण थे. पहला हाइड्रो पावर प्लांट से रॉयल्टी वसूलना और दूसरा हाइड्रो पावर प्लांट को निजी कंपनियों के लिए खोलना. हाइड्रो पावर प्लांट के निजीकरण की शुरुआत ने हिमाचल बिजली विभाग के कर्मचारियों को ख़ासा नाराज़ कर दिया. हड़ताल हो गई. एक महीने लम्बी हड़ताल. शांता ने इससे निपटने के लिए सख्ती से काम लिया. नई व्यवस्था लेकर आए. ‘नो वर्क,नो पेमेंट’ की नीति. इससे दूसरे सरकारी कर्मचारी भी नाराज़ हो गए. यह वो दौर था जब हिमाचल में कर्मचारी यूनियन बहुत मजबूत हुआ करती थीं. लेकिन शांता को इसकी कीमत चुकानी पड़ी. 1992 में बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद केंद्र सरकार ने बीजेपी शासित 4 राज्यों की सरकार बर्खास्त कर दी. दिसम्बर, 1993 में फिर से चुनाव हुए. राम मंदिर आंदोलन के बावजूद हिमाचल में बीजेपी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा. 68 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी 8 सीटों पर सिमट गई. खुद शांता को हार का सामना करना पड़ा. कांगड़ा की सुलाह सीट से. 3,267 के मार्जिन से.

ये तो हुई मुख्यमंत्रियों की बात. बीजेपी ने चुनावी समर में अपने और भी कई सेनापतियों की शहादत देखी है. किरण बेदी 2015 में दिल्ली में मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार थीं. कृष्ण नगर विधानसभा से हार आम आदमी पार्टी के एसके बग्गा के खिलाफ सामना करना पड़ा
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